Sunday, September 10, 2017

कलम मरती है तो बहुत कुछ मर जाता है

बांध दिए जाने और ख़त्म हो जाने की बीच से जाने वाली
संकरी गलियों में वो जूझता रहा
शब्दों के तहखाने से बहुत दूर निकल चुका
वापसी में अपने ही पदचिन्हों को ढूंडने की नाकाम कोशिश करता   

बहुत कुछ पाने की चाहत में
उसने जो बचाया था वो भी ख़त्म कर दिया
और अब अपनी ही बनाई भूलभुलैया में खुद को तलाशता
भटकता है सुबह-शाम

जंगल की अज्ञात कुटिया में
लालटेन की बुझती हुई रौशनी की आड़ में
वो अपनी परझाई को टटोलते हुए
ज़मी पर लिख रहा था
कलम मरती है तो बहुत कुछ मर जाता है......


No comments:

Post a Comment

धूल में उड़ते कण

हवा के थपेड़ों से गिरता रहा इधर-उधर   मकसद क्या था,कहाँ था जाना कुछ खबर न थी बस बहता रहा इस नदी से उस नदी तक इस डगर से उस डगर जि...