Tuesday, June 16, 2026

गति

 मैं गति के विपरीत बैठा 

रफ्तार से आगे बढ़ रही जिंदगी को देख रहा हूं

एक एक कर सभी मंजर दूर जा रहे हैं 

किसी एक स्टेटिक वस्तु को कुछ पल देख लेना का सुकून भी नही है

मैं ढहर कर हर पल महसूस करना चाहता था

लेकिन सब कुछ वक्त की तरह आगे बढ़ता जा रहा है

दूर टिमटिमाती एक रोशनी मद्धिम होती जा रही है

क्या इस वक्त की गति को रोका जा सकता है 


काश मैं अपनी किसी डायरी में वक्त को सुकून से रख देता 

जैसे रख देता था घर की टाढ पर रक्खे संदूक में 

कपड़ों से ढक कर अपनी सारी भावनाएं और अकांक्षाय



और खोलता उसे जब जरूरत लगती किसी नएपन की


पीछे छूट रही दुनिया

मन को एकाकीपन सा भर रहा है

खोखलेपन का अहसास सतह पर तैर रहा है


गति से कभी कभी डर लगता है

कहीं बहुत दूर ना निकल जाऊं 

जहां से वापसी कठिन हो

No comments:

Post a Comment

गति

 मैं गति के विपरीत बैठा  रफ्तार से आगे बढ़ रही जिंदगी को देख रहा हूं एक एक कर सभी मंजर दूर जा रहे हैं  किसी एक स्टेटिक वस्तु को कुछ पल देख ल...