मैं गति के विपरीत बैठा
रफ्तार से आगे बढ़ रही जिंदगी को देख रहा हूं
एक एक कर सभी मंजर दूर जा रहे हैं
किसी एक स्टेटिक वस्तु को कुछ पल देख लेना का सुकून भी नही है
मैं ढहर कर हर पल महसूस करना चाहता था
लेकिन सब कुछ वक्त की तरह आगे बढ़ता जा रहा है
दूर टिमटिमाती एक रोशनी मद्धिम होती जा रही है
क्या इस वक्त की गति को रोका जा सकता है
काश मैं अपनी किसी डायरी में वक्त को सुकून से रख देता
जैसे रख देता था घर की टाढ पर रक्खे संदूक में
कपड़ों से ढक कर अपनी सारी भावनाएं और अकांक्षाय
और खोलता उसे जब जरूरत लगती किसी नएपन की
पीछे छूट रही दुनिया
मन को एकाकीपन सा भर रहा है
खोखलेपन का अहसास सतह पर तैर रहा है
गति से कभी कभी डर लगता है
कहीं बहुत दूर ना निकल जाऊं
जहां से वापसी कठिन हो

