Showing posts with label क्षणिकाएं. Show all posts
Showing posts with label क्षणिकाएं. Show all posts

Wednesday, June 13, 2018


हे बापू
हम आये है यहाँ फिर एक बार तुम्हे वापस वतन ले जाने को
निकलो अब इस मूरत से और चलो हमारे साथ
आज हिसां की आग में लिपटा मेरा वतन  
तुम्हारी अहिंसा को भूल बैठा है
कॉर्पोरेट में जीता वतन
तुम्हारे ग्राम स्वराज को भूल बैठा हैं

आओ अब लौट चलें
हिंसा पर अहिंसा का और असत्य पर सत्य का परचम लहराएँ
कमजोरों की ताकत बने , असंगठित को संगठित बनायें
चलो बापू तुम्हारे सपनों को पूरा करें

इस मौसम की धुंध में मैं तुम्हे साफ़ देख पा रहा हूँ 
पहले से भी ज्यादा साफ़ 
और ये हवाएं जो तुम्हारे आंगन से दौड़ती चली आ रही है 
मेरे कानों में जो कह रही हैं
उसमें मैं तुम्हे महसूस कर सकता हूँ
अब तुम आओ या न आओ
मै यहीं ठहरे तुम्हारा इंतज़ार करूँगा ...ताउम्र


Monday, January 27, 2014


हर ओर गहन निराशा है                                 
उम्मीद का आँचल लहराओ
जग झूम उठे नाचे गाये
कोई गीत अब ऐसा गुनगुनाओ |

गति

 मैं गति के विपरीत बैठा  रफ्तार से आगे बढ़ रही जिंदगी को देख रहा हूं एक एक कर सभी मंजर दूर जा रहे हैं  किसी एक स्टेटिक वस्तु को कुछ पल देख ल...