Wednesday, November 13, 2013

तो मैं सिर्फ और सिर्फ युद्ध चाहता हूँ..



गर पडोसी मुल्कों से युद्ध करके
ही बदलाव संभव है,
गर हथियारों से ही विकास संभव है
गर युद्ध करके ही हम खुद को बचा पाएंगे
और इसी से हम भ्रष्टाचार भी मिटा पाएंगे,
पित्रात्मक सत्ता को ललकार पाएंगे,
मजदूरों की आवाज बुलंद कर पाएंगे,
कोख में मरती बेटियों को बचा पाएंगे,
गरीबों का शोषण रो़क पाएंगे ,
समाज से अन्धविश्वास का पर्दा हटा पाएंगे,
तो मैं सिर्फ और सिर्फ युद्ध चाहता हूँ
आओ काट दो पड़ोसियों के सर,
कुचल दो अहिंसा की आवाजें,
दिखा दो इंसानियत का नंगा नाच,
करो दो मानवता का कत्ले-ए-आम,
चलो अब युद्ध करो पडोसी मुल्कों से ,
आओं कर दो बदलाव........

3 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 14-11-2013 की चर्चा में दिया गया है
    कृपया चर्चा मंच पर पधार कर अपनी राय दें
    धन्यवाद

    ReplyDelete
  2. आओ काट दो पड़ोसियों के सर,
    कुचल दो अहिंसा की आवाजें,
    दिखा दो इंसानियत का नंगा नाच,
    करो दो मानवता का कत्ले-ए-आम,
    चलो अब युद्ध करो पडोसी मुल्कों से ,
    आओं कर दो बदलाव........
    BEHTAREEN

    ReplyDelete
  3. @02shalinikaushik धन्यवाद |

    ReplyDelete

धूल में उड़ते कण

हवा के थपेड़ों से गिरता रहा इधर-उधर   मकसद क्या था,कहाँ था जाना कुछ खबर न थी बस बहता रहा इस नदी से उस नदी तक इस डगर से उस डगर जि...