Monday, March 5, 2012

आलस

सावन के झोंके में ,
बारिश की वो घटा ,

कह रही थी मुझसे ,
उठ अब नाम कर ,
नित नए काम कर ,

मेरे कानो पर आहट ना हुई ,

सावन गुज़रा तो ,
मै उठा
 देखा तो ,
ठंड की हवाएं कह रही थी मुझसे ,
अभी समय है शेष ,
दौड पकड़ ले रफ़्तार ,

मै रजाई से ना निकला,
ठंड भी गई बीत ,

गर्मी ने अब दस्तक दी ,
कहा समय हुवा समाप्त ,
पंखा चला बिस्तर पकड़ ....

4 comments:

  1. उहापोह और अंतर्द्वंद को बखूबी दर्शाया है
    रजाई ने छोड़ा तो पंखे ने जकड़ा

    ReplyDelete
  2. बेहतरीन प्रस्तुति...

    आभार...

    ReplyDelete
  3. आंतरिक द्वन्द ... कब तक फंसे रहोगे ... उठाना तो है एक दिन ... क्यों नहीं आज ...
    आपको और परिवार में सभी को होली की मंगल कामनाएं ...

    ReplyDelete

कलम मरती है तो बहुत कुछ मर जाता है

बांध दिए जाने और ख़त्म हो जाने की बीच से जाने वाली संकरी गलियों में वो जूझता रहा शब्दों के तहखाने से बहुत दूर निकल चुका वापसी में अपन...